Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
चपलो लम्पटोऽर्थानामामोदसुखमारुतम् ।
उवाचोत्कन्धरं भूपं सपद्ममिव षट्पदः ॥ २९ ॥
विलोकय विभो तावदेकामिह खरोलिकाम् ।
पीठस्थ एव साश्चर्यां व्योम्नि चन्द्र इवावनिम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे भँवरा
सुगन्धयुक्त कमल से मधुर स्वर से बोलता है वैसे ही अत्यन्त चपल और धनलोलुप उसने
ऊपर को गर्दन किये हुए तथा सुगन्ध अतएव सुखकारी श्वासवायुवाले राजा से कहा : राजन्,
यहाँ पर आप एक आश्चर्ययुक्त मिथ्या कौतुक क्रीडा को सिंहासन में बैठे हुए ही इस प्रकार
देखिये, जिस प्रकार कि आकाश में स्थित चन्द्रमा आश्चर्यपूर्ण पृथिवी को देखता है