Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 1
31 verse-groups
- Verse 1उत्पत्ति प्रकरण पहला सर्ग केवल ज्ञान से ही आत्मा की मुक्ति होती है, कर्म और समाधि से नहीं…
- Verse 2(7 संस्कृत टीकाकारों ने उक्त श्लोक से अनेक अर्थ किये हैं उनमें से कुछ नीचे लिखे जाते हैं।…
- Verse 3इस प्रकार अवान्तर विषय और प्रयोजन दिखला कर विस्तारपूर्वक कथन की प्रतिज्ञा करते हैं। उनसे…
- Verse 4स्वप्न की नाई आत्मा में आविर्भूत हुआ प्रतीत होता है” ऐसा जो पीछे कहा गया है, उसका तात्पर्…
- Verse 5जिस प्रकरण में प्रायः मुमुक्षुओं के व्यवहारका वर्णन है, उसके अर्थात् सुमुक्षुव्यवहारप्रक…
- Verse 6यदि शंका हो कि मैं संसाररूप बन्धन की निवृत्ति का उपाय चाहता हूँ, मेरा दृश्य को मिथ्या सिद…
- Verse 7केवल दृश्य के अभावमात्र से बन्धन की निवृत्ति कही है, पर यह ठीक नहीं जँचता, क्यों कि उत्प…
- Verse 8चूँकि अपने स्वरूप के अज्ञान से ही बन्ध है, अत: अपने स्वरूप के बोध के लिए आगे के ग्रन्थ से…
- Verse 9भगवती श्रुति भी कहती है : न निरोधो न योत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुश्षुर्न वै मुक्…
- Verse 10ूर्वमेव हि यो यथा“ इससे उक्त अर्थ की उपपत्ति के लिए प्रलयावस्था में अवशिष्ट आत्मस्वरूप को…
- Verse 11तदुपरान्त अमूर्तं होने से क्रियारहित परिच्छेद (माप) से शून्य होने से अथाह (असीम), निर्धर्…
- Verse 12विद्वानों ने व्यवहार के लिए (५) उस सद्रूप सर्वव्यापक आत्मा के ऋत, आत्मा, पर, ब्रह्म, सत्य…
- Verse 13अब सृष्टि के आरम्भ में उसका मिथ्याभूत समष्टिजीवभाव कहते हैं । चैतन्यस्वभाव वही आत्मा अज्ञ…
- Verses 14–16इस प्रकार केवल ज्ञानशक्ति से होनेवाली सृष्टि को कहकर अब क्रियाशक्ति से युक्त ज्ञानशक्ति स…
- Verses 17–18यो हजारो अध्यारोपो से भी अधिष्ठान की पारमार्थिकता का विनाश नहीं किया जा सकता, यह दशनि के…
- Verse 19यदि यह स्वतः नहीं है तो सत् की नाई कैसे प्रतीत होता है ? इस शंका पर कहते हैं । जैसे मरुस…
- Verses 20–21अविद्या के अनुरूप नामों से अविद्या को दशति हैं। सर्वज्ञ विद्वानों ने जिसके अविद्या, संसार…
- Verses 22–23ज्ञान द्वारा क्रमशः नष्ट होने और प्राप्त होने योग्य बन्ध और मोक्ष का स्वरूप बतलातेहै। वस्…
- Verse 24कोड शंका करे कि यदि दृश्य का अभाव ही मोक्ष है, तो तत्-तत् काल में उपस्थित हुए दृश्य के…
- Verse 25हे विचारशील पुरुषों, दृश्य जगत् के विद्यमान रहते सैकड़ों तर्को से ओर तीर्थयात्रा तथा निय…
- Verse 26और दूसरी बात यह भी है कि यदि दृश्य स्वतः सत् माना जाय, तो सत् का बाघ न होने से कभी भी म…
- Verse 27यदि कोई कहे कि यह द्रष्टा पुरुष तप, ध्यान आदि के बल से दश्यशून्य तथा दृश्य के समावेश के अ…
- Verses 28–31उक्त का ही उपसंहार करते हैं। इसलिए दृश्य जगत् है और उसका तप, ध्यान और जप द्वारा जहाँ पर…
- Verses 32–33ज्ञान की अपेक्षा न करनेवाली निर्विकल्प समाधि से दृश्य के मार्जन की शंका कर कहते हैं । इस…
- Verses 34–36अतएव निर्विकल्प समाधि से भी दृश्य का मार्जन नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं । इस दृश्य प्रपंच…
- Verses 37–38२ “अक्षयसुषुप्ताभ” से मूढता का कभी उच्छेद न होने से उसमें अपुरुषार्थता सूचित होती है । उक…
- Verse 39दूसरी बात यह भी है कि यदि द्रष्टा अज्ञानी होनेसे आत्मभिन्न पाषाण आदि की ही समाधि में जबरद…
- Verse 40यदि कोई शंका करे कि जिनकी समाधि रूढ (परिपक्र) नहीं हुई हो, उन्हें भले ही स्थिरता प्राप्त…
- Verse 41इसलिए जिस बात को हम पहले कह आये है, वही सिद्ध हुई, ऐसा कहते हैं । इसलिए यदि यह दृश्य सत्…
- Verses 42–46अविद्यायुक्त द्रष्टा में दुष्य की स्थिति का दृष्टान्त द्वारा साधन करते हैँ । जैसे कमलगट्ट…
- Verses 47–48यदि सम्पूर्ण दृश्य हृदय में हैं, तो अभी सबको उसका अनुभव क्यों नहीं होता इस पर कहते हैं।…