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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verses 28–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 28-31

संस्कृत श्लोक

तस्मादस्ति जगद्दृश्यं तत्प्रमृष्टमिदं मया । त्यक्तं तपोध्यानजपैरिति काञ्जिकतृप्तिवत् ॥ २८ ॥ यदि राम जगद्दृश्यमस्ति तत्प्रतिबिम्बति । परमाणूदरेऽप्यस्मिंश्चिदादर्शे तथैव हि ॥ २९ ॥ यत्र तत्र स्थिते यद्वद्दर्पणे प्रतिबिम्बति । अद्यब्ध्युर्वीनदीवारि चिदादर्शे तथैव हि ॥ ३० ॥ ततस्तत्र पुनर्दुःखं जरा मरणजन्मनी । भावाभावग्रहोत्सर्गः स्थूलसूक्ष्मचलाचलः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त का ही उपसंहार करते हैं। इसलिए दृश्य जगत्‌ है और उसका तप, ध्यान और जप द्वारा जहाँ पर वह रहा वहीं पर उसे मिटा दिया और अन्य देश की प्राप्ति से उसका त्याग कर दिया, वह कथन बासी भात आदि के सड़े जल से तृप्ति करने की नाईहे। हे श्रीरामचन्द्रजी, यदि दृश्यरूप जगत्‌ है, तो उसका परमाणु के भीतर और चैतन्यरूपी आदर्श में भी वैसा ही प्रतिबिम्ब पड़ता है । भाव यह कि दृश्यरूप जगत्‌ जैसे विशाल प्रदेश में विद्यमान है, वैसे ही परमाणु में एवं चेतन आत्मा में भी, बिना संकोच के, उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है। दर्पण चाहे कहीं पर भी स्थित हो, उसमें जैसे पर्वत, समुद्र, पृथिवी, नदी के जल का प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही चैतन्यरूपी आदर्श में (आत्मा में) भी पडता है। उसके अनन्तर उस प्रतिबिम्ब में पुनः दुःख प्राप्त होता है - जरा, मृत्यु और जन्म प्राप्त होते हैं। जैसे जाग्रत अवस्था में स्थूल तथा स्वप्न में सूक्ष्म भाव और अभाव का ग्रहण ओर सुषुप्ति में उनका त्याग होता है, वैसे ही यह अस्थिर संसार रहता है