Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verses 37–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
प्राप्यते सति दृश्येऽस्मिन्न च किंनाम केनचित् ।
यत्र यत्र किलायाति चित्ततास्य जगद्भ्रमः ॥ ३७ ॥
द्रष्टाथ यदि पाषाणरूपतां भावयन्बलात् ।
किलास्ते तत्तदन्तेऽपि भूयोऽस्योदेति दृश्यता ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
२ “अक्षयसुषुप्ताभ” से मूढता का कभी उच्छेद न होने से उसमें अपुरुषार्थता सूचित होती है ।
उक्त अन्य के आशय का उत्तर देते हैं।
इस मनरूप दृश्य के रहते समाधिमें भले ही कोई कितना ही प्रयत्न क्यों न करे ? फिर
भी क्या उसे दृश्य प्राप्त नहीं होता, अवश्य प्राप्त होता है, क्योंकि जहाँ-जहाँ इसका चित्त
जाता है, वहाँ-वहाँ चित्त से उत्पन्न होनेवाले जगत्भमका भी निवारण नहीं किया जा
सकता