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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

सती वाप्यसती तापनद्येव लहरी चला । मनसेहेन्द्रजालश्रीर्जागती प्रवितन्यते ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि यह स्वतः नहीं है तो सत्‌ की नाई कैसे प्रतीत होता है ? इस शंका पर कहते हैं । जैसे मरुस्थल में मृगतृष्णा की नदी असत्‌ चंचल तरगों का सत्‌ के नाई विस्तार करती है वैसे ही मन से यह इन्द्रजाल सरीखा जगत्‌ सत्‌ न होता हुआ भी सत्‌ के समान बनाया जाता है