Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अहं तावद्यथाज्ञानं यथावस्तु यथाक्रमम् ।
यथास्वभावं तत्सर्वं वच्मीदं श्रूयतां बुध ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार अवान्तर विषय और प्रयोजन दिखला कर विस्तारपूर्वक कथन की प्रतिज्ञा
करते हैं।
उनसे अनात्मपदार्थो को ही देखता है) इत्यादि परमार्थपरक वाक्यों से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान से सबका
अधिष्ठान सन्मात्र जानता है, बाह्य इन्द्रियों की विषयप्रवृत्ति से मुक्त तथा प्रत्यडमुख हुआ वह ब्रह्म को
जानता है । बाह्य दृष्टि से देखा गया ब्रह्म भी अनर्थ ही है और प्रामाणिक प्रत्यग् दृष्टि से देखा गया जगत्
भी पुरुषार्थ के लिए होता है । यों सृष्टिविस्तार के बहाने प्रत्यग् दृष्टि के विकास कराने में ही इस ग्रन्थ
का तात्पर्य है, यह भाव है । अथवा आगे कही जानेवाली उपदेश वाणियों से तथा दृष्टान्त, आख्यान
और युक्तिरूप प्रकाशों से यह कहा जाता है कि ब्रह्मज्ञ ही परमार्थरूप से ब्रह्म है । ब्रह्मनाम का दूसरा कोई
पदार्थ व्यवहित दूर प्रदेश में आत्मा से अतिरिक्त है, ऐसी भ्रान्ति नहीं करनी चाहिए। जो यह दृश्य प्रपंच
है, वह स्वप्न की नाई परमात्मा में अध्यस्त हुआ प्रतीत होता है, वह भी परमार्थ सत्य अन्य पदार्थ है,
ऐसी भ्रान्ति को स्थान नहीं देना चाहिए । पूर्वोक्त ब्रह्मभाव ओर जगद्भाव में जो विवेकी अथवा अविवेकी
“मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मैं देवदत्त हूँ" , यों स्वाभाविक लौकिक प्रसिद्ध मिथ्या स्वशब्दों से उत्पन्न या
“ब्रह्मैवाहम्' (मैं ब्रह्म ही हूँ) “चिदेवाहम्” (मैं चित् ही हूँ) इत्यादि शास्त्रीय सत्य अर्थवाले स्वशब्दो से
उत्पन्न ज्ञान से जैसा अपना स्वरूप जानता है वैसा ही पुनः पुनः अनुभव करता है। संसारी आत्मा को
देखनेवाले को संसाररूप फल प्राप्त होता है और ब्रह्मात्मदर्शी को ब्रह्मभाव प्राप्त होता है, इसलिए जीव
को ब्रह्मात्मदर्शी होना चाहिए, यह भाव है । अथवा यदि किसी को शंका हो कि "यथास्थितं ब्रह्मतत्त्वं
सत्ता नियतिरूच्यते” तथा “अस्त्यनन्तविलासानामाश्रयः सर्वसंश्रयः“ (योगवासिष्ठ. १०/१ तथा ११
मुमुक्षु व्य.प्र.) इत्यादि से पूर्व में ब्रह्म का उपदेश हो ही चुका है । वहीं पर ब्रह्म का उपदेश देने पर शम, दम
आदि के अभाव में चित्त की अस्थिरता होने पर चित्त की स्थिरता के साधन, शम, दम आदि और उनकी
पुष्टि के लिए पौरुष का उपदेश दिया जा चुका है अब कोई भी उपदेष्टव्य वस्तु बची नहीं । यदि कहिये
कि एक बार उपदिष्ट वाक्यों से उत्पन्न ज्ञान से ब्रह्म का भान नहीं होता, तो सैकड़ों बार उसका उपदेश
देने पर भी वह वैसाका वैसा ही रहेगा । फिर पिष्टपेषणकी नाई उसके पुनः पुनः उपदेश से क्या फल
होगा ? इस पर कहते हैं। जो ब्रह्मवेत्ता श्रोता पुरुष एक बार उपदिष्ट वाक्यो के अर्थप्रकाश से “मैं ही ब्रह्म
हे बुध (७७), मैं पीछे संक्षेप से दिखलाये गये सम्पूर्ण पदार्थो को प्रमाणो ओर अनुभव के
अनुसार, वस्तु के अनुसार और स्वभाव के अनुसार क्रमशः विस्तारपूर्वक कहता हूँ, आप
सावधान होकर सुनिए