Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
अविद्या संसृतिर्बन्धो माया मोहो महत्तमः ।
कल्पितानीति नामानि यस्याः सकलवेदिभिः ॥ २० ॥
बन्धस्य तावद्रूपं त्वं कथ्यमानमिदं श्रृणु ।
ततः स्वरूपं मोक्षस्य ज्ञास्यसीन्दुनिभानन ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
अविद्या के अनुरूप नामों से अविद्या को दशति हैं।
सर्वज्ञ विद्वानों ने जिसके अविद्या, संसार, बन्धन, माया, मोह, महत्, तम (४) इत्यादि
र् विद्या से नाश्य होने के कारण वह अविद्या कही जाती है, ऊपर, नीचे और तिरछे गमन की
अनेक नामों की कल्पना की है । हे चन्द्रवदन, पहले मैं आपसे उस माया (बन्ध) का स्वरूप
कह रहा हूँ, उसे आप सावधान होकर सुनिए | उसके श्रवण के अनन्तर आप मोक्ष के स्वरूप
को समझ जायेंगे