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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 17-18

संस्कृत श्लोक

यथा कटकशब्दार्थः पृथक्त्वार्हो न काञ्चनात् । न हेम कटकात्तद्वज्जगच्छब्दार्थता परे ॥ १७ ॥ ब्रह्मण्येवास्त्यनन्तात्म यथास्थितमिदं जगत् । न जगच्छब्दकार्थेऽस्ति हेम्नीव कटकात्मता ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

यो हजारो अध्यारोपो से भी अधिष्ठान की पारमार्थिकता का विनाश नहीं किया जा सकता, यह दशनि के लिए दृष्टान्त देते हैं। जैसे सुवर्ण के बने हुए कटक (कड़ा) रूप सुवर्ण से कटक शब्द का अर्थ पृथक्‌ नहीं किया जा सकता, वैसे ही परब्रह्म में जगत्‌-शब्दार्थ है, अर्थात्‌ जगत्‌ शब्द का अर्थ परब्रह्म से पृथक्‌ नहीं किया जा सकता, क्योकि दृष्टान्त की नाई दोनों में भेद नहीं है । जैसे कटकरूपता सुवर्ण के स्वभाव के ही अन्तर्गत है कटकस्वभाव के अन्तर्गत नहीं है, वैसे ही परिच्छेद से रहित यह जगत्‌ शब्दार्थ भी अनन्तस्वरूप ब्रह्म के स्वभाव के ही अन्तर्गत है नाशवान्‌ अपने स्वभाव के अन्तर्गत नहीं है