Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
द्रष्टुर्दृश्यस्य सत्ताङ्ग बन्ध इत्यभिधीयते ।
द्रष्टा दृश्यबलाद्बद्धो दृश्याभावे विमुच्यते ॥ २२ ॥
जगत्त्वमहमित्यादिर्मिथ्यात्मा दृश्यमुच्यते ।
यावदेतत्संभवति तावन्मोक्षो न विद्यते ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान द्वारा क्रमशः नष्ट होने और प्राप्त होने योग्य बन्ध और मोक्ष का स्वरूप बतलातेहै।
वस्तु, दृश्य प्रपंच का अस्तित्व द्रष्टा का बन्ध कहा जाता हे । दृश्य के कारण ही द्रष्टा
बन्धन में पड़ा है और दृश्य के हट जाने से मुक्त हो जाता है । असत्य स्वरूप त्वम्" "अहम्"
(मैं) इत्यादि जगत् दृश्य कहलाता है जबतक यह दृश्य रहता है तब तक मोक्ष नहीं हो
सकता