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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

न च पाषाणतातुल्या निर्विकल्पसमाधयः । केषांचित्स्थितिमायान्ति सर्वैरित्यनुभूयते ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

दूसरी बात यह भी है कि यदि द्रष्टा अज्ञानी होनेसे आत्मभिन्न पाषाण आदि की ही समाधि में जबरदस्ती भावना (चिन्तना) करे, तो वह समाधि के अन्त में फलकाल में भी पुनः वश्यता को प्राप्त होता है । जिसमें केवल आत्मा का ही शेष रहता है, वह समाधि उसको प्राप्त नहीं होती है, ऐसा कहते हैं। यदि अज्ञानी द्रष्टा समाधि में समाधि के बल से लब्ध दुःखशून्य पाषाणता का चिन्तन करता रहता है तो समाधि के अन्त में उसको पुनः दृश्यता प्राप्त होती है ॥ ३ ८॥ समाधि द्वारा प्राप्त दुःखशून्य पाषाणता के प्राप्त होने पर भी स्थेर्यकी कोई आशा नहीं है, ऐसा कहते हैं। किसी की भी समाधिबल से प्राप्त दुःखशून्य पाषाणता के तुल्य निर्विकल्प समाधियाँ स्थिरता को प्राप्त नहीं होती, यह बात सभी समाधिनिष्ठ पुरुषों द्वारा अनुभूत है