Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
न्यायेनानेन लोकेऽस्मिन्सर्गे ब्रह्माम्बरे सति ।
किमिदं कस्य कुत्रेति चोद्यमूचे निराकृतम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
(7 संस्कृत टीकाकारों ने उक्त श्लोक से अनेक अर्थ किये हैं उनमें से कुछ नीचे लिखे जाते हैं।
अथवा जो अज्ञात होने के कारण मुमुक्षुओं की जिज्ञासा का विषय है, सम्पूर्ण लोगों को जिसका
आत्मरूपसे प्रत्यक्ष है, वह ब्रह्म वाचक शब्दसमूह और उससे प्रकाशित होनेवाले अर्थसमूह से श्रयं वा
इदं नाम रूपं कर्म” (नाम, रूप और कर्म ये तीन) इत्यादि श्रुति में प्रदर्शित द्रैतप्रपंच से अपृथक् अपने
को देखता हुआ अपने में स्वप्न की नाई, बन्धन, शोक मोह आदि से दुःखी प्रतीत होता है । जो अधिकारी
उस प्रकार से प्रतीत होते हुए भी ब्रह्म को केवल आत्मा का ही परिशेष बतलानेवाले नेति नेति" इत्यादि
वाक्य द्वारा द्रैतनिषेध से अवशिष्ट जानता है, वही ब्रह्म को यथार्थरूप से जानता है । आरोपित नाम,
रूप आदि को देखनेवाला पुरुष उसे नहीं जान सकता यह भाव है ।
अथवा ~ "वाग् से वचन (बोलना), गमन आदि क्रियाप्रधान कर्मेन्द्रियाँ लक्षित होती हैँ ओर "भाः“
से प्रकाशप्रधान ज्ञानेन्द्रियाँ लक्षित होती हैं । उक्त द्वारभूत ज्ञानेन्द्र ओर कर्मेन्द्रियों से जो वस्तुतः ब्रह्म
को भी देखता है वह स्वयं ब्रह्म होता हुआ भी आत्मा में स्वप्न की नाई अब्रह्ममूत अन्यथा प्रतीत होता है,
कारण कि बहिर्मुख पुरुष को तत्त्वदर्शन नही हो सकता, "पराचि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात्पराङ््
पश्यति नान्तरात्म् (परमात्मा ने इन्द्रियों को अनात्मविषयक बना कर उनकी हिंसा की, इसलिए जीव
इस प्रकार उत्पत्ति-प्रकरण के संक्षिप्त अर्थ के प्रदर्शन द्वारा अवान्तर विषय के दिखलाने
पर (प्रपंच मिथ्या है“ इत्याकारक ज्ञानरूप अवान्तर प्रयोजन से संबन्ध रखनेवाले पूर्वोक्त
दूषण का परिहार भी अथात् हो गया, ऐसा कहते हैँ ।
पीछे संक्षेप से प्रदर्शित ओर आगे विस्तार से कहे जानेवाले “अध्यस्त पदार्थ का अधिष्ठान
से पृथक् अस्तित्व नहीं है” इस न्याय से या अध्यारोपाअपवादन्याय से अध्यासक्रमसे दृश्यमान
इस प्रपंचरूप सृष्टि के ब्रह्म रूप होने पर या सृष्टिके अपवादक्रम से ब्रह्ममात्र शेष रहने पर :
तदेतद्धगवान् ब्रूहि किमिदं परिणश्यति । किमिदं जायते भूयः किमिदं परिवर्धते ॥ इत्यादि से
“यह क्या है, किसका है ओर कहाँ पर स्थित है” यों आपने पीछे (१/१२/१७) जो सत् के
नाशादि के असंभवका दूषण दिया, वह स्वतः ही निराकृत हो गया, क्योंकि सत् का नाश नहीं
माना गया है, विनाशी की सत्ता नहीं मानी गई हे, इसलिए आपने जो दोष दिया, उसका यह
विषय ही नहीं है, यह भाव हे