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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verses 32–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

इदं प्रमार्जितं दृश्यं मया चात्राहमास्थितः । एतदेवाक्षयं बीजं समाधौ संसृतिस्मृतेः ॥ ३२ ॥ सति त्वस्मिन्कुतो दृश्ये निर्विकल्पसमाधिता । समाधौ चेतनत्वं तु तुर्यं चाप्युपपद्यते ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञान की अपेक्षा न करनेवाली निर्विकल्प समाधि से दृश्य के मार्जन की शंका कर कहते हैं । इस दृश्य जगत्‌ का मैंने परिमार्जन कर लिया और यहाँ पर मैं समाधि में स्थित हूँ, समाधि में संसार के स्मरण का यह कभी क्षय न होनेवाला बीज है । भाव यह है कि जिसका स्मरण नहीं हुआ, उसका मार्जन नहीं हो सकता और उसका स्मरण होने पर तो समाधि का ही भंग हो जायेगा