Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verses 14–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verses 14–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 14-16
संस्कृत श्लोक
ततः स जीवशब्दार्थकलनाकुलतां गतः ।
मनो भवति भूतात्मा मननान्मन्थरीभवन् ॥ १४ ॥
मनः संपद्यते तेन महतः परमात्मनः ।
सुस्थिरादस्थिराकारस्तरङ्ग इव वारिधेः ॥ १५ ॥
तत्स्वयं स्वैरमेवाशु संकल्पयति नित्यशः ।
तेनेत्थमिन्द्रजालश्रीर्विततेयं वितन्यते ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार केवल ज्ञानशक्ति से होनेवाली सृष्टि को कहकर अब क्रियाशक्ति से युक्त
ज्ञानशक्ति से साध्य सृष्टि को कहते हैं।
तदनन्तर क्रियाशक्ति की प्रधानता से सम्पन्न प्राण के धारण से चंचलता को प्राप्त हुआ
वह भौतिकलिंगात्मा संकल्प और विकल्प के मननसे जड़तावश मन्द होकर मन बन जाता है ।
जैसे निश्चल आकारवाला समुद्र चंचल आकारवाले तरंगभाव को प्राप्त होता है, वैसे ही वह
मनरूप बन जाने से अपने महान् परमात्मभाव को भूलकर मन के संकल्प, विकल्प आदि धर्मों
को अपने धर्म समझने लगता है। इस प्रकार समष्टि मनोभाव को प्राप्त हुआ हिरण्यगर्भनामक
ब्रह्म स्वयं ही (दूसरे द्वारा बोध पाये बिना ही) पूर्ववासना के अनुसार विराट्-भाव को, भुवन
आदि भावको और वहाँ पर स्वेदज, उद्धिज्ज, अण्डज और जरायुज रूप चार प्रकार के
जीवभावों का नित्य संकल्प करता रहता हे । उस सत्यसंकल्प से इस प्रकार इन्द्रजाल की नाई
यह विशाल सृष्टि फैलाई जाती हे