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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, Verses 34–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 1, verses 34–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 34-36

संस्कृत श्लोक

व्युत्थाने हि समाधानात्सुषुप्तान्त इवाखिलम् । जगद्दुःखमिदं भाति यथास्थितमखण्डितम् ॥ ३४ ॥ प्राप्तं भवति हे राम तत्किं नाम समाधिभिः । भूयोऽनर्थनिपाते हि क्षणसाम्ये हि किं सुखम् ॥ ३५ ॥ यदि वापि समाधाने निर्विकल्पे स्थितिं व्रजेत् । तदक्षयसुषुप्ताभं तन्मन्येतामलं पदम् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव निर्विकल्प समाधि से भी दृश्य का मार्जन नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं । इस दृश्य प्रपंच के रहते निर्विकल्प समाधि नहीं हो सकती। निर्विकल्प समाधि होने पर ही तो चित्त के रहने पर चेतनता और चित्त का बाध होने पर तुर्यपद की उपपत्ति होती है। दृश्य के रहते तो निर्विकल्प समाधि का अवसर ही कहाँ २।३३॥ समाधि भले ही हो फिर भी संसार की निवृत्ति नहीं हो सकती, ऐसा कहते हैं। जैसे सुषुप्ति के (गाढ़ी नींद के) पश्चात्‌ दुःखमय यह सारा जगत्‌ प्राप्त हो जाता है, वैसे ही समाधि टूटने पर यह दुःखमय सम्पूर्ण जगत्‌ ज्यों का त्यों भासमान प्रत्यक्‌ आत्मा मेँ प्राप्त हो जाता है, इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, फिर भी जब अनर्थ-प्राप्ति की संभावना रही तो क्षणमात्र की समाधि से क्या सुख ? इसलिए समाधि से कौनसा प्रयोजन सिद्ध होता है ? यदि निर्विकल्प समाधि में कभी अव्युत्थान को प्राप्त हो, तो ज्ञान के बिना भी अक्षय सुख प्राप्त हो गया, ऐसा यदि कोई माने, तो वह निर्मल पद को कभी क्षीण न होनेवाली सुषुप्ति के तुल्य मानता है (७७)