Guru's AddaGuru's Adda

Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 22

इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त बाईसवाँ सर्ग शोक, मोह, इष्टवियोग का दुःख, रोग आदि से परिपूर्ण तथा चिन्ता ओर तिरस्कार के घर वृद्धावस्था की निन्दा |

35 verse-groups

  1. Verse 1युवावस्था में काम आदि दोष बड़े प्रबल रहते हैं, इसलिए युवक को भले ही सुख न हो, किन्तु वृद्…
  2. Verse 2पामर लोगों के परम प्रेमपात्र विषययुख के गृहभूत शरीर को ही जो वृद्धावस्था नष्ट- भ्रष्ट कर…
  3. Verse 3यदि विष का छोटा-सा टुकड़ा खा लिया जाय, तो वह जैसे थोड़ी देर मेँ देह को कुरूप कर देता है,…
  4. Verse 4जिनके सब अंग शिथिल और छिन्न-भिन्न हो गये हैं, और वृद्धावस्था से शरीर जर्जरित हो गया है, ऐ…
  5. Verse 5अनायास दीनता को प्राप्त करानेवाली वृद्धावस्था जव मनुष्य को पकड़ती है तब सौत से तिरस्कृत (…
  6. Verse 6नौकर-चाकर, पुत्र, स्त्रियाँ, बन्धु-बान्धव और सगे-सम्बन्धी सभी लोग वृद्धावस्था से काँप रहे…
  7. Verse 7जैसे गीध फलयुक्त शाखा और टहनियों के फैलाव के कारण अन्य पक्षियों के आक्रमण से रहित अति उन्…
  8. Verse 8दीनतारूपी दोष से परिपूर्ण, हृदय में सन्ताप पहुँचानेवाली और सम्पूर्ण आपत्तियों की एकमात्र…
  9. Verse 9खेद है, परलोक में मैं क्या करूँगा, इस प्रकार का अतिभीषण भय, जिसका कोई प्रतीकार नहीं हो सक…
  10. Verse 10हे महर्षे, मैं कौन हूँ, बड़ा दुःखी-दीन हूँ, मैं क्या करूँ, कैसे करूँ, अच्छा चुपचाप मौन ही…
  11. Verse 11वृद्धावस्था में, अपने आत्मीय जनों से मुझे किस प्रकार कब कुछ स्वादिष्ट भोजन प्राप्त होगा,…
  12. Verse 12वृद्धावस्था में भोजन की शक्ति होने पर पचाने की अशक्ति, पचाने की शक्ति होने पर भोजन की अशक…
  13. Verses 13–14मुनिवर, जब विविध दुःखों से शरीर का अपकार करनेवाली, रोगरूपी सांपों से व्याप्त वृद्धावस्थार…
  14. Verse 15जैसे सायंकाल की सन्ध्या के उत्पन्न होने पर अन्धकार उसके पीछे दौड़ता है अर्थात्‌ सायंकाल ह…
  15. Verse 16मुनिश्रेष्ठ वृद्धावस्था से कपास की नाई फूले हुआ (सफेद केश और मूँछ-दाढ़ी से युक्त) देहरूपी…
  16. Verse 17निर्जन नगर की यथा कदाचित्‌ कुछ शोभा हो भी सकती है, जिसकी सबकी सब लताएँ कट चुकी है, वह वृक…
  17. Verse 18जैसे शब्द करनेवाली गृध्री (गीध की स्त्री) निगलने के ही लिए शीघ्र मांस के टुकड़े को पकड़ ल…
  18. Verse 19जैसे वालिका उत्सुकता के साथ देखकर ओर सिर पकड़कर कमल के फूल को तोड़ लेती हे, वैसे ही वृद्ध…
  19. Verse 20जैसे धूलि के कणों से कठोर ओर सी-सी कार करानेवाली (सी-सी शब्द करानेवाली) शिशिर ऋतु के तेज…
  20. Verse 21वृद्धावस्था से तहस-नहस ओर जर्जरित शरीर तुषार (हिम) के कणों से व्याप्त अतएव म्लान (मुरञ्ाय…
  21. Verses 22–23यह वृद्धावस्थारूपिणी चाँदनी सिररूपी पर्वत के शिर से उदित होते ही वातरोग ओर खाँसीरोगरूपी क…
  22. Verse 24भगवन्‌, कालरूपी स्वामी वृद्धावस्थारूपी लवणादि चूर्ण से धूसर पुरुषों के सिररूपी कूष्माण्ड…
  23. Verse 25पहले वृद्धावस्थारूपी बिल्ली योवनरूपी चूहे को खाती है, फिर उद्धत होकर उसे शरीर का मांस खान…
  24. Verse 26इस संसार में ऐसी अमंगलकारिणी कोई नहीं है, जैसे कि रोदन करनेवाली (शब्द करनेवाली) देहरूपी ज…
  25. Verse 27खाँसी और साँस के साँय-साँय शब्द से युक्त दुःखरूपी धुँआ और कालिख से पूर्ण यह वृद्धावस्थारू…
  26. Verse 28जैसे सफेद पत्तोवाली ओर फूलों से लदी २ वृद्धावस्था में नेत्रो की ज्योति के कुछ कम क्षीण हो…
  27. Verses 29–30वृद्धावस्थारूपी कपूर से सफेद देहरूपी केले के पेड को कालरूपी हाथी निःसन्देह एक क्षण में उख…
  28. Verse 31पीछे से आनेवाले मृत्युरूपी राजा की वृद्धावस्थारूपी सफेद चँवरो से युक्त चिन्ता-व्याधिरूपी…
  29. Verse 32वृद्धावस्थारूपी हिम से संकुचित (चारों और हिम से पूर्ण हो जाने के कारण कम अवकाशवाले) शरीरर…
  30. Verse 33लाठीरूपी तीसरे पैरसे युक्त, बारबार लड़खड़ा रही तथा खाँसी और अधोवायुरूपी मुरजसे (पखावज से)…
  31. Verse 34गन्ध अर्थात्‌ रागद्वेष आदि से चित्त को (दूसरे पक्ष में सभाको) वासित करनेवाला विषयभोग (ओर…
  32. Verse 35मुनीश्वर, वृद्धावस्थारूपी चन्द्रोदय से शुभ (सफेद ओर प्रकाशमय) शरीररूपी नगर में स्थित जीवि…
  33. Verse 36वृद्धावस्थारूपी चूने के लेप से (पुताई से) शुभ्र शरीररूपी अन्तःपुर के (रनवास के) भीतर अशक्…
  34. Verse 37जिन जरायुज, अण्डज, स्वेदज ओर उद्भिज्जरूप चार प्रकार के शरीरो में पहले वृद्धावस्था आक्रमण…
  35. Verse 38अपनी किसी इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकता, इसलिए दुःखप्रद दुष्ट जीवन की दुराग्रहपूर्वक इच्छा…