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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अपर्याप्तं हि बालत्वं बलात्पिबति यौवनम् । यौवनं च जरा पश्चात्पश्य कर्कशतां मिथः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

युवावस्था में काम आदि दोष बड़े प्रबल रहते हैं, इसलिए युवक को भले ही सुख न हो, किन्तु वृद्धावस्था में काम आदि दोषों के शान्त हो जानेपर एवं विनीत पुत्र, पौत्र आदि द्वारा घर में सेवा होने पर वृद्ध को अति आनन्द होता है, ऐसी शंका कर वृद्धावस्था में अनन्त दुःखो का विस्तार से वर्णन करने की इच्छा से पहले अपने बच्चों का नाश करनेवाले सपो को दूसरे के बच्चों पर दया कैसे हो सकती है" इस न्याय से वृद्धावस्था अति कठोर है, यह कहते हैं। खेल-कूद कौतूहल आदि की अभिलाषा के पूर्ण न होने पर ही युवावस्था आकर जबर्दस्ती बाल्यावस्था को निगल जाती है, तदुपरान्त स्त्रीसंभोग आदि की इच्छा की पूर्ति न होने पर ही वृद्धावस्था आकर युवावस्था को स्वाहा कर देती है अतः इन दोनों की (युवावस्था और वृद्धावस्था की) परस्पर कठोरता को देखिये अर्थात्‌ उसी शरीर में होनेवाली बाल्यावस्था को यौवन निगल गया अतएव यौवन कठोरतर हुआ, उक्त कठोरतर यौवन को निगलनेवाली वृद्धावस्था कठोरतम न होगी, तो क्या होगी ?

सर्ग सन्दर्भ

इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त बाईसवाँ सर्ग शोक, मोह, इष्टवियोग का दुःख, रोग आदि से परिपूर्ण तथा चिन्ता ओर तिरस्कार के घर वृद्धावस्था की निन्दा |