Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

हिमाशनिरिवाम्भोजं वात्येव शरदम्बुकम् । देहं जरा नाशयति नदी तीरतरुं यथा ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

पामर लोगों के परम प्रेमपात्र विषययुख के गृहभूत शरीर को ही जो वृद्धावस्था नष्ट- भ्रष्ट कर देती है, उसमे सुख की आशा कहाँ ? जैसे तुषाररूपी वज कमलों को नष्ट-भ्रष्ट कर देता है, जैसे आँधी शरदऋतु की ओस को (पत्तों के सिरे पर लटक रहे जलकण को) नष्ट कर देती है और जैसे नदी तट के वृक्ष को उखाड़ देती है, वैसे ही वृद्धावस्था शरीर को नष्ट कर डालती है