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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verses 13–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

जराजीर्णबकी यावत्कायक्लेशापकारिणी । रौति रोगोरगाकीर्णा कायद्रुमशिरःस्थिता ॥ १३ ॥ तावदागत एवाशु कुतोऽपि परिदृश्यते । घनान्ध्यतिमिराकाङ्क्षी मुने मरणकौशिकः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

मुनिवर, जब विविध दुःखों से शरीर का अपकार करनेवाली, रोगरूपी सांपों से व्याप्त वृद्धावस्थारूपी जीर्ण बगुली शरीररूपी वृक्ष की चोटी पर बैठकर बासती है, उसी समय निविड मूर्च्छारूपी अन्धकार को चाहनेवाला मृत्युरूपी उल्लू झटपट कहाँ से आया हुआ ही दिखाई देता हे