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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

दुष्प्रेक्ष्यं जरठं दीनं हीनं गुणपराक्रमैः । गृध्रो वृक्षमिवादीर्घं गर्धो ह्यभ्येति वृद्धकम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे गीध फलयुक्त शाखा और टहनियों के फैलाव के कारण अन्य पक्षियों के आक्रमण से रहित अति उन्नत पुराने वृक्षपर आता है, वैसे ही कुरूप, वृद्ध, गुण और सामर्थ्य से शून्य अतएव दीन वृद्ध पुरुष मेँ बडी अभिलाषा आती है