Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
शून्यं नगरमाभाति भाति च्छिन्नलतो द्रुमः ।
भात्यनावृष्टिमान्देशो न जराजर्जरं वपुः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्जन नगर की यथा कदाचित् कुछ शोभा हो भी सकती है,
जिसकी सबकी सब लताएँ कट चुकी है, वह वृक्ष भी कुछ शोभित हो सकता है, अनावृष्टि से पीड़ित
देश की भी कुछ न कुछ शोभा हो सकती है, मगर वृद्धावस्था से जर्जरित शरीर की कुछ भी शोभा नहीं
है, अर्थात् वह इन सब दृष्टान्तों से बढ़कर अभद्र है