Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
संसारसंसृतेरस्या गन्धकुट्यां शिरोगता ।
देहयष्ट्यां जरानाम्नी चामरश्रीर्विराजते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
गन्ध अर्थात् रागद्वेष आदि से चित्त को (दूसरे पक्ष में
सभाको) वासित करनेवाला विषयभोग (ओर कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थ) इस संसाररूपी राजा के
व्यवहार से सम्बन्ध रखनेवाली और विषयभोग की कुटी आश्रय देहरूपी यष्टि के सिर पर बैठी हुई
वृद्धावस्था नामक चँवरशोभा विराजमान है अर्थात् जैसे राजा के व्यवहार से सम्बन्ध रखनेवाली और
कस्तूरी आदि सुगन्धि पदार्थो को रखने की यष्टि के ऊपर स्थित चमरश्री अपने अनुपम सौन्दर्य,
सुगन्धित ओर मन्द मन्द वायु के प्रसारसे शोभित होती है, वैसे ही विषय भोग की आश्रयभूत इस देह में
सिर पर बैठी हुई वृद्धावस्था भी शोभित होती है