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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

न जिताः शत्रुभिः संख्ये प्रविष्टा येऽद्रिकोटरे । ते जराजीर्णराक्षस्या पश्याशु विजिता मुने ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

पीछे से आनेवाले मृत्युरूपी राजा की वृद्धावस्थारूपी सफेद चँवरो से युक्त चिन्ता-व्याधिरूपी अपनी निजी सेना पहले निकलती है। अर्थात्‌ जैसे कोई राजा जब कहीं जाता है, तब चँवर से युक्त उसकी सेना पहले निकलती है वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए ॥ ३ ०॥ मुनिवर, बड धैर्य से दुर्गम पहाड़ों की गुफाओं में बैठे हुए जिन लोगों को रण में शत्रु नहीं हरा सके, उन्हें भी वृद्धावस्थारूपी वृद्ध राक्षसी ने शीघ्र हरा दिया, यह आश्चर्य देखिये