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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

अभावोऽग्रेसरी यत्र जरा जयति जन्तुषु । कस्तत्रेह समाश्वासो मम मन्दमतेर्मुने ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

जिन जरायुज, अण्डज, स्वेदज ओर उद्भिज्जरूप चार प्रकार के शरीरो में पहले वृद्धावस्था आक्रमण करती है और उसके आगे मृत्यु अवश्य आनेवाली है, उन्हीं शरीरो में से एक इस शरीर में (उन शरीरो के सजातीय इस शरीर में) मुझ अतत्त्वज्ञ का क्या विश्वास हो सकता है ? पहले वृद्धावस्था का तदन्तर मृत्यु का ग्रास होनेवाले इस शरीर मे मेरी तनिक भी आस्था नहीं हे, यह भाव हे