Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 16
पन्द्रहर्वौँ सर्ग समाप्त सोलहवाँ सर्ग श्रीरामचन्द्र द्वारा चित्त और मन के विविध दोषों का युक्तियों ओर दृष्टान्तो से विस्तारपूर्वक वर्णन |
24 verse-groups
- Verse 1अहंकार के समान चित्त और मन भी सुखहेतु नहीं है, किन्तु दुःख हेतु ही हैं, ऐसा कहते हैं । श्…
- Verse 2उपर्युक्त कथन को ही दुष्टान्त द्वारा स्फुट करते हैं। अत्यन्त व्याकुल चित्त युक्त ओर अयुक्…
- Verse 3से उसमें कुछ भी जल नहीं रहता, वैसे ही व्यग्रचित्तवाले अशान्त लोगों का अन्तःकरण भी पूर्ण न…
- Verse 4जैसे अपने सजातीयं के झुण्ड से बिछुड़ा हुआ एवं बन्धन में पड़ा हुआ मृग सुख को प्राप्त नहीं…
- Verses 5–6हे मुने, तरंग के समान चंचल वृत्ति को धारण कर रहा मेरा मन स्थूल और सूक्ष्म अवयवो के छेद के…
- Verse 7भोगों की प्राप्ति के हेतुभूत उत्साहरूप कल्लोल से जिसने डूबने लायक आवर्तं बना रक्खे हैं, म…
- Verse 8ब्रह्मन्, मनरूपी हरिण नरक की परवाह न कर भोगरूपी दूब के तिनको की अभिलाषा से युक्त होकर ती…
- Verse 9जैसे समुद्र अपनी चंचलता का त्याग नहीं करता, वैसे ही चिन्तासक्त और च॑चलस्वभाव मेरा मन भी स…
- Verse 10जैसे पिंजडे में बँधा हुआ सिंह विविध चिन्ताओं से पूर्ण होकर चंचल चित्तवृत्ति से एक जगह स्थ…
- Verse 11चित्त स्वतः ही वपलस्वभाव है, विविध चिन्ताओं द्वारा और भी विचलित किया जाता है, इसलिए हठपूर…
- Verse 12हे मुनिनायक, चित्त की आत्माभिमुखी वृत्तियाँ (स्वभाव) विविध द्वैत विषयों मेँ आसक्तिकल्पनार…
- Verse 13जिसमें यह मैं हूँ” और "यह मेरा है” इस प्रकार अन्योन्यतादात्म्याध्यास और अन्योन्य- (7 एकात…
- Verse 14मुने, जैसे दुःसह धूम और ज्वाला से युक्त अग्नि सूखे तृण को जला डालती है, वैसे ही विस्तारित…
- Verse 15जैसे क्रूर और तृष्णा के समान सदा भूखी कुत्ती के पीछे चलनेवाला कुत्ता शव को खा जाता है, वै…
- Verses 16–17मुनिवर, जैसे तरंगों से चंचलवृत्तिवाला जल का वेग तट के वृक्ष को उखाड़ कर फेंक देता है, वैस…
- Verse 18इस संसाररूपी सागर से पार होने के लिए नित्य उद्योग कर रहे मुझ को यह कुत्सित चित्त इस भाँति…
- Verse 19पृथिवी से (उर्ध्व प्रदेश से) पाताल को (अधः प्रदेश को) और पाताल से (अधः प्रदेश से) पृथिवी…
- Verse 20जैसे बालकों को डराने के लिए कल्पित वेताल (विकरालस्वरूप) बालक को सत्य प्रतीत होता है, किन्…
- Verse 21ब्रह्मन्, मन अग्नि से भी अधिक उष्ण, पर्वत से भी दुरारोह, वज्र से भी बढ़कर कठोर है, इसलिए…
- Verse 22जैसे मांसभक्षी चील, कौए आदि पक्षी मांस को देखते ही उसे खाने के लिए दौड़ पडते हैं हित और अ…
- Verse 23हे तात, जैसे समुद्र जडस्वभाव (जलरूप), चंचल, बड़े बड़े आवर्तो से (भौरियों से) भरा ओर अनेक…
- Verse 24हे साधो, समुद्र को पीने, सुमेरू पर्वत को लाँघने और अग्निभक्षण से भी चित्त को अपने वश में…
- Verses 25–26लोक नष्ट हो जाते हैं । हे मुने, इसलिए प्रयत्नपूर्वक मन की चिकित्सा करनी चाहिए अर्थात् रो…
- Verse 27मुमुश्षु पुरुषों ने जिस चित्त के जीतने पर शम, दम आदि गुणों के स्वाधीन होने की, काम, कर्म…