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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verses 25–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, verses 25–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 25,26

संस्कृत श्लोक

चित्तं कारणमर्थानां तस्मिन्सति जगत्त्रयम् । तस्मिन्क्षीणे जगत्क्षीणं तच्चिकित्स्यं प्रयत्नतः ॥ २५ ॥ चित्तादिमानि सुखदुःखशतानि नूनमभ्यागतान्यगवरादिव काननानि । तस्मिन्विवेकवशतस्तनुतां प्रयाते मन्ये मुने निपुणमेव गलन्ति तानि ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

लोक नष्ट हो जाते हैं । हे मुने, इसलिए प्रयत्नपूर्वक मन की चिकित्सा करनी चाहिए अर्थात्‌ रोग की तरह चित्त का अवश्य परित्याग करना चाहिए । हे मुनिवर, जैसे विन्ध्याचल आदि श्रेष्ठ पर्वत से अनेक वनों की उत्पत्ति होती है, वैसे ही मन से ही ये सैकड़ों सुख-दुःख उत्पन्न हुए हैं। ज्ञान से चित्तके क्षीण होने पर वे अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं, ऐसा मेरा निश्चय है