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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

भोगदूर्वाङ्कुराकाङ्क्षी श्वभ्रपातमचिन्तयन् । मनोहरिणको ब्रह्मन्दूरं विपरिधावति ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌, मनरूपी हरिण नरक की परवाह न कर भोगरूपी दूब के तिनको की अभिलाषा से युक्त होकर तीव्र वेग से बहुत दूर तक दौड़ता है, अर्थात्‌ जैसे मृग गर्त मेँ गिरने की चिन्ता न कर दूबके तिनको के लोभ से वेग के साथ बहुत दूर तक दौड़ते हैं, वैसे ही मेरा मन नरकपतन का भय छोडकर भोगलाभ की आशा से बहुत दूर तक दौड़ता हे