Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
अनल्पकल्पनातल्पे विलीनाश्चित्तवृत्तयः ।
मुनीन्द्र न प्रबुध्यन्ते तेन तप्येऽहमाकुलः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनिनायक, चित्त की आत्माभिमुखी वृत्तियाँ (स्वभाव) विविध द्वैत विषयों मेँ आसक्तिकल्पनारूप
शय्या पर सोई हुईं हैं, वे बोध देनेवाले शास्त्र ओर आचार्य के उपदेश के बिना केवल अपनी बुद्धि से किये
गये हजार बार के विचार से भी नहीं जागती | उन वृत्तियों के न जागने से व्याकुल हुआ मैं सन्तप्त
हूँ