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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

क्रोडीकृतदृढग्रन्थितृष्णासूत्रे स्थितात्मना । विहगो जालकेनेव ब्रह्मन्बद्धोऽस्मि चेतसा ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसमें यह मैं हूँ” और "यह मेरा है” इस प्रकार अन्योन्यतादात्म्याध्यास और अन्योन्य- (7 एकात्मविज्ञान ही अभय पद ओर समतासुख है । साम्यसुख ही नित्य ओर निरतिशय है । उससे अतिरिक्त जो कुछ है वह सभी असार और दुःखप्रद है । देहात्मविज्ञान सबसे बढ़कर असार है । इस शरीर में सार और असार दोनों विद्यमान हैं, परन्तु मोहग्रस्त मन असार का ही ग्रहण करता है, सार का ग्रहण नहीं करता | संसर्गाध्यासरूप दृढ ग्रन्थियाँ पड़ी हैं, ऐसे भोगस्पृहारूपी जाल में स्थित मैं अपने-आप चित्त द्वारा बाँधा गया हूँ, जैसे कि अनाज के दानों के लोभ से पक्षी बहेलिए द्वारा जाल से बोधा जाता है