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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verses 16–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

तरङ्गतरलास्फालवृत्तिना जडरूपिणा । तटवृक्ष इवौघेन ब्रह्मन्नीतोऽस्मि चेतसा ॥ १६ ॥ अवान्तरनिपाताय शून्ये वा भ्रमणाय च । तृणं चण्डानिलेनेव दूरे नीतोऽस्मि चेतसा ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

मुनिवर, जैसे तरंगों से चंचलवृत्तिवाला जल का वेग तट के वृक्ष को उखाड़ कर फेंक देता है, वैसे ही तरंग के समान चंचल वृत्तिवाले जड़ चित्तने मेरी भी दशा कर रखी हे । धर्मकर्मो से स्वर्ग के प्राप्त होने पर अनवसर में ही स्वर्ग से गिरने के लिए अथवा स्वर्गप्राप्ति के हेतु धर्मकर्म के न होने पर सुखलेश से शून्य इसी लोक में कीट, पतंग आदि योनियोंमें भ्रमण करने के लिए चित्तने मेरी वह दशा कर रक्खी है, जैसे कि आँधी तृण की दशा करती है। आँधी भी आकाश में उड़ रहे तृण को भूमि पर पटक देती है और भूमि पर स्थित तृण को इधर-उधर उड़ा देती है