Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
मनो मोहरथारूढं शरीरात्समतासुखम् ।
हरत्यपहतोद्वेगं हंसः क्षीरमिवाम्भसः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त स्वतः ही वपलस्वभाव है, विविध चिन्ताओं द्वारा और भी विचलित किया जाता है, इसलिए
हठपूर्वक उसका विरोध करने पर भी वह धैर्य को प्राप्त नहीं होता, यह भाव है ।
जैसे हंस जल से दूध को निकाल लेता है, वैसे ही मेरा मोह रूपी रथ पर सवार मन भी इस शरीर से
उद्वेगरहित समतारूप सुख को हर लेता हे । अर्थात् उत्कर्ष ओर अपकर्ष ओपाधिक हैं (उपाधिकल्पित
हैं) अतएव परमार्थरूप से सब प्राणियों मे आत्मा एकरूप से ([--)) विद्यमान है । जीवन्मुक्तो द्वारा
उक्त प्रकार से अनुभूत आत्मा की एकरूपता ही समतासुख कही जाती है । मन के मोहाक्रान्त होने पर
इस शरीर में पहले से प्राप्त भी उस समतासुख को मन ग्रस लेता हे । ओर असार (तुच्छ) देहमात्र में
आत्मभाव बच जाता है, यह भाव है