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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

मिथ्यैव स्फाररूपेण विचाराद्विशरारुणा । बालो वेतालकेनेव गृहीतोऽस्मि कुचेतसा ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बालकों को डराने के लिए कल्पित वेताल (विकरालस्वरूप) बालक को सत्य प्रतीत होता है, किन्तु बाल्यावस्था के बीतनेपर उसके लिए वह असत्य हो जाता हे, वैसे ही अज्ञान से मुझे दुर्जय प्रतीत होनेवाला ओर विचार करने पर असत्यस्वरूप मन से मैं गृहीत हूँ जैसे कि बालक वेताल से गृहीत होता हे