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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

चेतः पतति कार्येषु विहगः स्वामिषेष्विव । क्षणेन विरतिं याति बालः क्रीडनकादिव ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मांसभक्षी चील, कौए आदि पक्षी मांस को देखते ही उसे खाने के लिए दौड़ पडते हैं हित और अहित का विचार नहीं करते, वैसे ही मन भी इन्द्रिय द्वारा देखे गये विषयों में टूट पडता है हित ओर अहित का विचार नहीं करता और क्षणभर में उससे विरत हो जाता हे । जैसे बालक खिलौने को देखते ही उस पर टूट पड़ता है और थोडी देर के बाद उसे छोडकर दूसरा खेल खेलने लगता है