Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
चेतश्चञ्चलया वृत्त्या चिन्तानिचयचञ्चुरम् ।
धृतिं बध्नाति नैकत्र पञ्जरे केसरी यथा ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पिंजडे में बँधा हुआ सिंह विविध चिन्ताओं से पूर्ण होकर चंचल चित्तवृत्ति से एक
जगह स्थिर नहीं रह सकता, वैसे ही विविध चिन्ताओं से अतिचपल ओर चंचल वृत्ति से युक्त मेरा मन
भी एक जगह धैर्य को नहीं प्राप्त हो रहा हे