Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 16, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
इतश्चेतश्च सुव्यग्रं व्यर्थमेवाभिधावति ।
दूराद्दूरतरं दीनं ग्रामे कौलेयको यथा ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उपर्युक्त कथन को ही दुष्टान्त द्वारा स्फुट करते हैं।
अत्यन्त व्याकुल चित्त युक्त ओर अयुक्त विचार के बिना इधर-उधर दूर से भी दूर प्रदेश तक,
ग्राम में कुत्ते की नाई, घूमता है कहीं पर भी अपनी पूर्ति के उपाय को न पाकर दीन-हीन बना रहता है
अर्थात् जैसे कुत्ते अपने उदर की पूर्ति के लिए व्यग्रचित्त होकर ग्राम में दूर से भी दूरतर प्रदेश में घूमते हैं,
वैसे ही दोषों से तुष्ट चित्तवाले व्यक्ति भी वृथा ही इधर-उधर घूमते हैं, अभीष्ट वस्तु न पाकर दीन-
हीन बने रहते हैं