Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 92
इक्यानबेवाँ सर्ग समाप्त बानवेवों सर्ग वायु की धारणा से वायुभाव प्राप्त हो जाने पर वायु के कार्यो का विस्तार तथा आकाश के साथ सवत्मिभाव में स्थिति-यह वर्णन।
63 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तदनन्तर मैंने जगत् देखने की उत्कण्ठा से वायुमय धारणा बोधी ।…
- Verse 2मैं वायु बन गया । मैं वायु बनकर लतारूपी ललनाओं के साथ विलास करता था तथा कमल, उत्पल, कुन्द…
- Verse 3मैं जलकणों की राशि को इधर उधर बिखेरने तथा नीहारसमूह को लीला से (क्रीडा से) दूर दूर तक हरण…
- Verse 4तृण, गुल्म, लता, वल्ली तथा पत्तों को ताण्डव नृत्य सिखलाने मेँ महापण्डित भी मैं बन गया एवं…
- Verse 5मंगल के अवसरों में भावी कल्याण को सूचित करने के लिए मैं मृदु यानी मन्द, सुगन्ध एवं शीतल ह…
- Verse 6भद्र, स्वर्ग में कुन्द, मन्दार आदि के मकरन्द ओर पराग (पुष्पधूलि) से धूसर तथा नरक मेँ अंगा…
- Verse 7जव मैं समुद्र में रहता था, तब मेरी गति सरल तरंगों की रेखाओं से अनुमित होती थी और जब मैं आ…
- Verse 8मैं नक्षत्र रूपी राजसेना का बड़े वेग से आगे की ओर बढ़ा हुआ रथ था (प्रवह नाम का कायु नक्षत…
- Verse 9मेरी इतनी शीघ्र गति थी कि मैं चित्त का (मनका) सहोदर भाई-सा था, मैं यों तो अनंग था, फिर भी…
- Verse 10तुषार कणों की जब महती वृष्टि होती थी, तब तुषार कणरूपी धवल रोमों के कारण मैं बूढा सा लगता…
- Verse 11भद्र, नन्दनवन में मधुर सुगन्धि के कारण मेरा गमन अति मधुर और उदार होता था तथा जब मैं कुबेर…
- Verse 12भगवती भागीरथी के तरंगरूपी हिण्डोलों के आन्दोलनं से मुझे श्रम-सा अवश्य लगता था, परन्तु दूस…
- Verse 13ऋतुराज वसन्त की वनिता जैसी लताओं को में नर्मस्पर्शो से दीर्घकाल के लिए चपल बनाता था । वे…
- Verse 14चन्द्रबिम्ब में सर्वश्रेष्ठ अमृत का दीर्घकाल तक पान कर, पूर्ण मेघरूप शय्यापर शयन कर तथा क…
- Verse 15मैं समस्त धूलियों के लिए आकाशगामी घोड़ा तथा सुगन्धरूपी मत्त मातंगका उल्लासप्रद महान् मित…
- Verse 16तडित्रूपी सींग को (गोपाल बालकों के वाद्य को) प्राप्त कर उसके नाद से मैं मेघरूपी दुधार पशु…
- Verse 17आकाशरूपी फूल की मैं सुगन्ध था, इसीलिए आकाश के गुण सब शब्दों का भ सहोदर भाई भी बन गया तथा…
- Verse 18सब प्राणियों का प्राणभूत तथा हृदय आदि मर्म स्थानरूप होने के कारण मर्म कार्य करनेवाले सब स…
- Verse 19सुगन्धरूपी रत्नों का भँ लुटेरा था, यानी जबरन कलीरूपी गाँठ खोलकर चुरा लेनेवाला विमानरूप नग…
- Verse 20प्राण, अपान की कलारूप रज्जु से मैं प्राणियों के यन्त्रो का चालक था, द्वीपो का तरगों से खण…
- Verse 21भद्र, मैं सामने रहता था फिर भी मेरे स्वरूप को कोई देख नहीं पाता था, अतएव मैं मनोराज्य से…
- Verse 22प्रलयकाल में एक क्षणांश में ही बड़े-बड़े पर्वतों को उखाड़कर फेंक देता था । अनेक वर्णरूप त…
- Verse 23मैंने वायुरूप होकर धूम्र, मेघ, रज ओर जलो का एक आवर्त-सा खड़ा कर दिया था तथा आकाशगंगा के प…
- Verse 24झंझावातरूप शरीर के वेष्टन से निर्मुक्त जीर्ण -शीर्ण तृणों में मे मन्द मन्द गति देता था, स…
- Verse 25व्योमरूपी जंगल का मैं मतवाला हाथी था, शरीररूपी घर का मैं गर्गट (निरन्तर शब्द करनेवाला एक…
- Verse 26भद्र, वायुरूप बनकर मैंने छः प्रकार की क्रियाएँ करते करते प्रलयपर्यन्त कभी भी विश्राम नहीं…
- Verse 27श्रीरामजी, रसके आकर्षण के लिए मैं निरन्तर व्यग्र रहता था, इससे तेजका मैं भाई-सा बन गया था…
- Verse 28शरीररूपी महानगर में नाड़ी के मार्गों से किसी तरह की विघ्नबाधा (रोकटोक) के बिना अप्रतिहत ग…
- Verse 29शरीररूपी नगरों के नाश और निर्माण में अकेला मैं तत्पर रहता था । अन्नरसों के मल, सूक्ष्मतर…
- Verse 30तदनन्तर वायुमण्डल में भी परमाणु तक के एक-एक द्रव्य के अन्दर भी मैंने रजत की शिला के सदृश…
- Verse 31यद्यपि यहाँ प्रत्येक परमाणु में अनेक सृष्टियाँ बहती हुई-सी प्रतीत होती हैं, तथापि परमार्थ…
- Verses 32–33प्रत्येक परमाणु में किन किन पदार्थो के साथ चछरष्टिर्यो विमान - सी हैं; इसे कहते हैं / उन…
- Verse 34वहाँ स्वर्ग, भूमि, पातालतल तथा अन्यान्य लोकान्तर थे, भाव, अभाव, वैधुर्य, जरा, मरण, आदि की…
- Verse 35यों आकाशभाव में भी आकाश के जो विलास हैं; उनका भी अनुभव समझ लेना चाहिए, इस आशय से कहते हैं…
- Verse 36जेते जेते विहार किया; उसका विस्तार के साथ वर्णन करते हैं / भद्र, पृथ्वी, जल, वायु, ओर तेज…
- Verse 37अमृत से पूर्णं (घनीभूत) अंगोंवाले तथा चन्दन के द्रव के समान शीतत्व आदि गुणों से सुशोभित च…
- Verse 38अपने उपभोग के बाद बचा हुआ पुष्परस भ्रमर को देते उए मैंने सभी ऋतुओं में सब ओर विविध सुगन्ध…
- Verse 39विस्तीर्ण, उन्नत, कोमल तथा आकाशरूपी आँगन में कलापूर्णरूप रीति से बिछाई हुई, मक्खन की स्थल…
- Verse 40भद्र, शिरीष के फूलों से भी अधिक कोमल तथा नीलकमल की-सी मनोहर कान्तिवाली देवांगनाओं तथा सिद…
- Verse 41कुमुद, कह्लार तथा कमलों से पूर्ण रम्य वनों मे तथा कमलिनियों के जंगलों में मेने मधुरभाषिणी…
- Verse 42रामजी, बह रहीं नदीरूप सारवान् नाड़ियों के मूलभूत भूमण्डलों से युक्त तथा स्फुरणशील व्याघ्…
- Verse 43जगत् में जो गगन, पर्वत आदि प्रसिद्ध हैं, उन्होने नदीरूप सूत्र एवं समुद्रो के साथ मेरे अं…
- Verse 44सिद्ध, विद्याधर आदि प्राणियों के समूहों ने ब्रह्माण्डभूत मेरे शरीर में विश्राम किया । वे…
- Verses 45–46तब क्या मक्खी, जूँ आदि के स्वथ भयभीत एवं प्रतिक्षण हटाये जाने के कारण उब्विग्न होकर उन्हो…
- Verse 47भद्र, ब्रह्माण्डरूप होकर मैंने सात समुद्रों से वेष्टित तथा सात द्वीपों के कारण सात रूप धर…
- Verse 48राघव, नदीरूप नाड़ियों से निर्मल (शुद्ध) भीतर स्थित प्रचुर रससे पूर्ण, नाना छिद्रों से युक…
- Verse 49मेरे हृदयाकाश में असंख्य ऐरावत आदि हाथी गूलर के अन्दर मच्छरों की नाई स्थित थे जिन पर चन्द…
- Verse 50यों यद्यपि मैं अतिविस्तृत ब्ह्माण्डरुप था, तथापि मैने परम सूक्ष्म विन्मात्र स्वभावता का प…
- Verse 51यद्यपि मैं समस्त दिशाओं में, सभी स्थलों में, सभी कालों में सर्वात्मा बनकर सब कुछ व्यवहार…
- Verse 52उस समय मैंने परिच्छननता-अपरिच्छिन्नता आदि सब विरुद्ध धर्मों का एक साथ अपनी आत्मा में अनुभ…
- Verse 53जैसे चाँदी की शिला के अन्दर अनन्त जगत् विद्यमान हैं; कैसे ही समुद्र के पेट में जितने प्र…
- Verse 54जैसे दर्पण प्रतिबिम्बरूप से अनेक नगरों को धारण करता है, वैसे ही चेतनस्वरूप मैंने अपने अंग…
- Verse 55हे राघव, इस प्रकार जल, वायु एवं अग्निरूपता, भूमिरूपता का अपनी आत्मा से मैंने ऐसे निर्माण…
- Verse 56और उस अवस्था में मैंने आकाशकोश में स्थित प्रत्येक परमाणु के भीतर भी असंख्य जगत देखे
- Verse 57भद्र, और भी सुनिये, उस अवस्था में प्रत्येक परमाणु के भीतर असीम आकाश स्थित था और उस आकाश म…
- Verse 58मेँ आध्यासिक आत्मा का ही स्वरूपभूत भूमण्डल तथा द्वीपकुण्डलरूप बन गया था । यों सर्वात्मक ह…
- Verse 59शरीरधारी जो मनुष्य आदि जीव हैं, उनके उपकारार्थं ही लता, तृण, अंकुर आदि सबका उत्पादन करते…
- Verse 60जैसे युद्ध जीव-संहार है, वैसे ही बोधकाल अज्ञान-संहारक है । उक्त बोधदशा प्राप्त करने पर अत…
- Verse 61किस रुप से वे जगत् रहते हैं और किस रूपसे नहीं रहते, इस प्रश्न का उत्तर यह है कि चिति के…
- Verse 62मैंने कहीं भी जो कुछ अनुभव किया, जो कुछ बनाया, जो कुछ कष्ट सहा, वह सब परमार्थभूत चिदात्मा…
- Verse 63हे श्रीरामजी, इसलिए अध्यारोपदृष्टि से प्रत्येक में अपनी सत्ता का समर्पण करने के कारण मैं…
- Verse 64है, यह बात प्रबुद्ध योगियों के लिए है यानी ज्ञानी महात्माओं की दृष्टि में जगत् का स्वरूप…
- Verse 65इसलिए अद्गय परमात्मा में जो विद्वान सर्वत्र सवत्सिकता कहते हैं. वह केवल कल्पनामात्र हैं,…