Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
स्त्यानीकरणसंशोषधृतिस्पन्दनसौरभैः ।
सशैत्यैः कर्मभिः षड्भिरलब्धक्षण आक्षयम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, वायुरूप बनकर
मैंने छः प्रकार की क्रियाएँ करते करते प्रलयपर्यन्त कभी भी विश्राम नहीं लिया । मेरे वे छः कर्म थे -
हिम, घी आदि का पिण्ड बनाना, कीचड़ आदि को सूखाना, मेघ आदि को धारण करना, तृण
आदि में हलचल पैदा करना, सुगन्ध को इधर-उधर ले जाना तथा ताप हरना