Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
आमोदरत्नलुण्टाको विमाननगरावनिः ।
दाहान्धकारशीतांशुः शैत्येन्दुक्षीरसागरः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
सब प्राणियों का प्राणभूत तथा हृदय आदि
मर्म स्थानरूप होने के कारण मर्म कार्य करनेवाले सब स्थानों का मैं ही एक आत्मा बन गया,
हृदयगुहारूप घर का मैं सिंह था, मैं निरन्तर नियम से संचरण करता रहा, तथा मैं अग्नि के बलका
ज्ञाता था, क्योकि दुर्बल जानकर दीपक को बुझा देता था और बलिष्ठ जानकर मित्रभाव से अग्नि
को बढा भी देता रहा