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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

मृदुर्मङ्गलकालेषु ललनालोकलालकः । भीम उत्पातकालेषु पर्णवत्प्रौढपर्वतः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

मंगल के अवसरों में भावी कल्याण को सूचित करने के लिए मैं मृदु यानी मन्द, सुगन्ध एवं शीतल होकर ललना जनों के प्रेम का भाजन बन जाता था, उत्पात समय में तो भावी उत्पातो को सूचित करने के लिए भयंकर तीक्ष्ण, उष्ण ओर असह्य बन जाता था, प्रलयकाल में तो पर्वतों को भी पत्तों के सदुश उड़ा देता था