Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
एवं नाम तदा राम भूतपञ्चकरूपिणा ।
मया प्रविहृतं तत्र त्रैलोक्यनलिनोदरे ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
यों आकाशभाव में भी आकाश के जो विलास हैं; उनका भी अनुभव समझ लेना चाहिए, इस
आशय से कहते हैं ।
हे श्रीरामजी, यों उस समय पृथ्वी आदि पाँच भूतों का रूप धारण कर मैंने उस त्रिलोकीरूप
कमल के उदर में खूब विहार किया