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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 51

पचासवाँ सर्ग समाप्त डक्यावनवाँ सर्ग ब्रह्मदृष्टि में कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ और आत्मदृष्टि में मिथ्या उत्पन्न जगत्‌ तत्वज्ञान से जिस तरह निवृत्त हो जाता है, उस तरह का वर्णन।

49 verse-groups

  1. Verse 1पहले के सर्ग रमे एक यह बात कही गृ है कि ब्रह्म से पहले उत्पन्न जीव केवल जाग्रत जीव हैं। इ…
  2. Verse 2श्रीरामजी, आपकी शंका तो बहुत ही ग्राधारण हे कि कूटस्थ अद्य ब्रह्म से केवलजाग्रत जीव तो उत…
  3. Verse 3कूटस्थ से उसका यदि संभव है, तो उससे अन्य जीव सजीव हो सकते हैं, परन्तु कारण के अभाव से वे…
  4. Verse 4उपदेश ओर उपदेशयोग्य वस्तु के लिए शब्दार्थ की एकमात्र कल्पना की गई है
  5. Verse 5यह आपकी बात हम मानते हैं; पर भोग के आधार शरीरादि का कर्म आदि द्वारा या स्राक्षात्‌ कोई नि…
  6. Verse 6हाँ. यह बात ठीक होती, यदि शरीरादि का कर्ताः मोहित होनेवाला, मोहक आदि-ये छव श्रुति आरि प्र…
  7. Verse 7अनादि, अनन्त अवभासस्वरूप जो बोधात्मा है, वह अपने ही स्वरूप में स्थित होकर ऐसे नाना पदार्थ…
  8. Verse 8बाह्म पदार्थ कैसे भीतरी चेतन के विवर्त हो सकते हैं; क्योकि कोनो के आधार अलग-अलग हैं; इस श…
  9. Verse 9बीज से वृक्ष बाहर निकलता है, यह व्ष्टान्त विषम है, इस प्रकार की आशंका कर समान हृष्टान्त ब…
  10. Verse 10वस्तुतः चेतन नाम की वस्तु न भीतर हैं और न बाहर है, किन्तु अनन्त हैं, उसी के भीतर चुयन्ध ओ…
  11. Verse 11यदि शक्रा हो कि समस्त जगत्‌ की कल्पना यहीं पर हैं, तो ब्रह्मलोक आदि परलोक जिसमें अर्वि आद…
  12. Verse 12यदि प्रत्यगात्मा ही परलोक देश, काल आदविरुप हैं; तो देश, काल आदि का बाध हो जाने पर वह थुन्…
  13. Verse 13यदि वह शून्यरुप नहीं हैं, तो दूसरे लोग भी एकमात्र प्रपंच का अपनाप कर उस पद में अपनी बोधयत…
  14. Verse 14भद्र, जो पुरुष सरल और गम्भीर अहन्तारूप गड़े में गिरे हुए हैं, वे कोई भी उस आत्मपदरूप प्रक…
  15. Verse 15आत्मप्रकाश देखनेवालों को जगत्‌ का ज्ञान केसा रहता है, इस पर कहते हैं / चौदह प्रकार के ये…
  16. Verse 16ज्ञानी को समाहितद्रष्टि ओर व्यवहारद्रष्टि से जगत्‌ जैता भासता हैं, उसे बतलाते हैं / सृष्ट…
  17. Verse 17यदि कारण में कार्य की स्थिति होगी, तो उसकी कारणता ही कैसी, क्योंकि वह तो कार्यरूप ही ज्ञा…
  18. Verse 18प्रशान्त महासमुद्र में जैसे तरंग, भँवर आदि स्थित हैं, वैसे ही क्षोभशून्य परब्रह्म में ये…
  19. Verse 19जैसे अपने भीतर अनेक बर्तनों को रखनेवाला एक ही मिट्टी का पिण्ड रहता है, ठीक वैसे ही अनेक ब…
  20. Verse 20पिण्डदशा में घट पिण्डकरूप और घट दशा में पिण्ड घटरूप है यों घट के स्वरुपवेत्ताओं को जैसे ए…
  21. Verse 21जाग्रतू-दशा में यदि हम लोग यह विचार करें कि यह जयत्‌ केवल चित्तरुप ही है, तो वह स्वप्नतुल…
  22. Verse 22सम्यक्‌ ज्ञान से यानी आत्मा के सत्यज्ञान से देहरूप के साथ ये सब भूत ज्ञानी के पिण्ड को सम…
  23. Verse 23जैसे विनाश की ओर उन्मुख हुआ मेघ तत्काल ही गगनरूप बन जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान से यह अहंक…
  24. Verse 24शरत्‌काल के मेव के सदृश चारों ओर से छिन्‍न-भिन्‍न हुआ मृगतृष्णाजल के सदृश मिथ्या प्रतीयमा…
  25. Verse 25जैसे धधक रही अग्नि में विलीन सोना, घी ओर इन्धन एकरूप बन जाता है, वैसे ही विज्ञानकाल में भ…
  26. Verse 26तीनों जगत्‌ में जो एक प्रकार का रूप कल्पित किया गया है, वह तत्त्वज्ञान से धीरे-धीरे ऐसे व…
  27. Verse 27अग्नि आदि कारण जब तक लाख के फास रहते है, तब तक ही उसमें कठिनता का विलय रहता है / यदि अग्न…
  28. Verse 28इन कव बातों से निष्कर्ष यह निकला कि निथ्याश्रूत जग्रतः चित्त आदि के रूप में मिथ्या अज्ञान…
  29. Verse 29इससे पहले की बात प़िद्ध हो यह कि जाग्रत्‌ प्रफव ही स्वप्नदशा में अपनी स्थूलता छोड़कर सूक्…
  30. Verse 30देश-कालरूप निमित्त के बिना जाग्रत्‌-स्वप्न का निर्माण कर यथास्थित बोधरूप साक्षी चेतन ही घ…
  31. Verse 31शरत्‌काल के क्षीण हो जाने पर जैसे जल स्वल्प हो जाता है, वैसे ही स्वप्न के सदृश अत्यन्त तु…
  32. Verse 32दृश्य वस्तुओं की कान्ति जब अत्यन्त तुच्छरूप भासने लग जाती है, तब उनकी स्थिति होने पर भी व…
  33. Verse 33आत्मदुख से अत्यन्त तृप्त होने के कारण ज्ञानी भी विषयों का आदर नहीं करता, यह कहते हैं। कहा…
  34. Verse 34श्रीरामजी, चित्तमात्रस्वरूप यह जगत्‌ जब यहाँ भ्रान्तिरूप और स्वप्नमात्र स्वरूप बनकर स्थित…
  35. Verse 35अप्त्य भी ज्ञानी को यदि रुचते हों. तो क्या हानि है 2 इस पर कहते हैं / हे महामते, समीप में…
  36. Verse 36जगत्‌ में सत्यत्व बुद्धि के विलीन हो जाने पर शान्तबुद्धि ज्ञानी जगत्‌ को अपिण्डात्मक आकाश…
  37. Verse 37केवल चित्त के ही विलासस्वरूप स्वप्नात्मक फूल-माला, चन्दन आदि की भोगभावना जाग्रत्‌ पुरुष क…
  38. Verse 38हे श्रीरामजी, जिसको अवस्तुरूप समझ लिया, फिर उसकी ग्राह्यता कैसी ? भला ऐसा कौन पुरुष है, ज…
  39. Verse 39भद्र, स्वप्न के सदृश दृश्य पदार्थो को जब जान लिया जाता है, तब उससे मनुष्य का प्रेम निकल ज…
  40. Verse 40इसकी ।िवृत्ति हो जाने पर यह केसे स्थित रहता है 2 यह कहते हैं / दृश्य पदार्थ जिसको नीरस हो…
  41. Verse 41दीपकी शिखा जब नष्ट हो जाती है, तब उसकी किरणें जैसे नष्ट हो जाती है, वैसे ही जब रस नीरसरूप…
  42. Verse 42ज्ञान से पूर्व गन्धर्वनगर के सदृश प्रतीत हो रहा सम्पूर्ण जगत्‌ तत्त्वज्ञान से दीपक की किर…
  43. Verse 43तब सप्तम भूमिका की स्थिति से वह किस तरह का होता है, इसे बतलाते हैं / तत्त्वज्ञानी पुरुष स…
  44. Verse 44भद्र, जो तत्पद वस्तु है, उसमें न आत्मा है, न शून्य है और न जगत्‌ की कल्पना ही है, अधिक क्…
  45. Verse 45अज्ञानियों के द्वारा पिण्डरूप से जाना गया जो यह पृथ्वी आदि का स्वरूप है, वह ज्ञानी के प्र…
  46. Verse 46ज्ञानी पुरुष एकमात्र आत्मसमाधि में चित्त को लगाकर आकाश के सदृश निर्मल बन जाता है, सब आसक्…
  47. Verse 47श्रीरामजी, जिसका मन मर गया है और जो सर्वबाधावधि आत्मपद को प्राप्त हुआ है, ऐसा मननशील मौनी…
  48. Verse 48राघव, चूँकि जो सम्पूर्ण शरीर, शरीरों के आधार भुवन, भुवनाधार गगन तथा विहार स्थान पर्वत है,…
  49. Verse 49ज्ञानवान का अन्तःकरण शान्त रहता है, उसके विकल्प विनष्ट हुए रहते हैं, वह अपने स्वरूपभूत आत…