Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
बाह्यं न विद्यते किंचिद्बोधः स्फुरति बाह्यवत् ।
उदेति बोधहृदयाद्बीजादिव वरद्रुमः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्म पदार्थ कैसे भीतरी चेतन के विवर्त हो सकते हैं; क्योकि कोनो के आधार अलग-अलग
हैं; इस शंका पर कहते हैं /
श्रीरामचन्द्रजी, असल में तो बाहर के कोई पदार्थ ही नहीं हैं, ज्ञानरूप आत्मा ही बाहर
के सदृश भासता है, वह बोधरूप हृदय से ही बाहर ऐसे उदय को प्राप्त होता है, जैसे बीज
से बड़ा वृक्ष