Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
चतुर्दशविधानन्तभूतजातसुघुंघुमा ।
जगद्दृष्टिरियं ज्ञस्य शरीरावयवोपमा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मप्रकाश देखनेवालों को जगत् का ज्ञान केसा रहता है, इस पर कहते हैं /
चौदह प्रकार के ये जो भूतसमूह हैं, उनके घुंघुं शब्दों से परिपूर्ण जगत्दृष्टि ज्ञानी के लिए जो
देहावयव-जैसी है, यानी अपने से भिन्न उसे भासती ही नहीं