Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
कथं केवलजाग्रत्त्वमकारणमनर्थकम् ।
पराद्विकसति ब्रह्मन्गगनादिव पादपः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले के सर्ग रमे एक यह बात कही गृ है कि ब्रह्म से पहले उत्पन्न जीव केवल जाग्रत
जीव हैं। इस विषय मे यह शका होती है केला कहना युक्तियुक्त नहीं है, क्योकि कूटस्थ अद्रय
ब्रह्म पहले जीकभाव धारण कर उत्पन्न हो ही नहीं स्रकता, ऐसा करने में न तो उसको करर
प्रयोजन है और न कोई बीज है अपितु काम, कर्म आदि की वास्नाएँ जीव स्वभाव के बाद
ही होती हैं; इस प्रकार की आशंका श्रीरामभद्र करते हैं।
श्रीरामभद्र ने कहा : ब्रह्मन्, कूटस्थ अद्रय परब्रह्म से केवल जाग्रत नाम के जीव अर्थ और बीज
के बिना, आकाश से वृक्ष की नाई, कैसे उत्पन्न होते हैं ?
सर्ग सन्दर्भ
पचासवाँ सर्ग समाप्त डक्यावनवाँ सर्ग ब्रह्मदृष्टि में कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ और आत्मदृष्टि में मिथ्या उत्पन्न जगत् तत्वज्ञान से जिस तरह निवृत्त हो जाता है, उस तरह का वर्णन।