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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

स्वप्नकाले स्वप्न एव जाग्रद्व्यग्रापरिग्रहात् । जाग्रत्काले जाग्रदेव स्वप्नः सत्यावबोधतः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

पिण्डदशा में घट पिण्डकरूप और घट दशा में पिण्ड घटरूप है यों घट के स्वरुपवेत्ताओं को जैसे एक का ही व्यवस्थित ज्ञान होता हैं, वैसे ही प्रपंच में भी स्वप्नदशा में जाग्रत्‌ स्वप्नादिरूप और जाग्रत्काल में स्वप्न जाग्रदुप व्यवस्थित जगत्‌ के एकरूप का ही तत्त्वो को ज्ञान होता हैं, यह कहते हैं / स्वप्नकाल मे स्वप्न ही जाग्रद्रूप ज्ञानियों द्वारा जाना जाता है, क्योंकि वासनाओं के विस्तार से व्यग्र मन उनके पास नहीं है और जाग्रत्‌काल में जाग्रत्‌ को स्वप्नरूप जानते हैं, क्योंकि उनको सत्यात्मा का परिज्ञान हो चुका है