Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
कस्य स्वदन्तेऽसत्यानि कथमेव महामते ।
मृगतृष्णाजलानीव दृश्यान्यपि पुरःस्थितैः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
अप्त्य भी ज्ञानी को यदि रुचते हों. तो क्या हानि है 2 इस पर कहते हैं /
हे महामते, समीप में स्थित पुरुषों द्वारा असत्यरूप से देखे गये मृगतृष्णा-जल आदि क्या
किसी को भी रुचते हैं ? अर्थात् वे किसी ज्ञानी को किसी तरह भी अच्छे नहीं लगते