Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
क्व किल स्वात्मविश्रान्तिः क्वैतद्विषयवेदनम् ।
सुषुप्तजाग्रतोरैक्यं भ्रान्ताभ्रान्तात्मनोर्भवेत् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मदुख से अत्यन्त तृप्त होने के कारण ज्ञानी भी विषयों का आदर नहीं करता, यह
कहते हैं।
कहाँ अपनी आत्मा में विश्रान्ति ओर कहाँ यह विषयों का परिज्ञान । यदि ज्ञानी को भी विषय
भले प्रतीत होने लगें, तो सुषुप्त ओर जाग्रत् की एकता ओर मूढ और तत्त्वज्ञ की एकता हो जायेगी
यानी दोनों में कोई पार्थक्य ही नहीं रह जायेगा