Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
यदवस्त्विति विज्ञातं तत्रोपादेयता कुतः ।
केन स्वप्नं परिज्ञाय स्वप्नहेमाभिगम्यते ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
श्रीरामजी, जिसको अवस्तुरूप समझ लिया, फिर उसकी ग्राह्यता कैसी ? भला ऐसा कौन पुरुष है,
जो स्वप्न जानकर भी स्वप्न सुवर्ण को लेने के लिए उसकी ओर दौडता हो ?