Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
बोधस्यानन्तरूपस्य स्वयमेवात्मनात्मनि ।
जगच्चित्तादिता भाता पिण्डबन्धः किलात्र कः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
अग्नि आदि कारण जब तक लाख के फास रहते है, तब तक ही उसमें कठिनता का विलय
रहता है / यदि अग्नि आदि पास में रहते, तो कठिनता क्रा निलय भी हट जाता है, क्या इसी तरह
का यह जयब्रिलय तत्वज्ञान से होता ह, यदि ऐसा विलय हुआ; तो निमित्त के हट जाने पर फ़िर
जयत् ज्यों का त्यो बना रहेया, ऐसी आशंका पर कहते हैं कि तत्वज्ञान असत्य का विरोधी होने
के कारण उक्ते हआ विलय फिर लौटकर नहीं आता, जैसे कि शुकित के तत्वज्ञान से बाधित
शुक्तिरुप ज्ञान फिर नहीं होता, इस आशय से कहते हैं /
देश, काल और वस्तु की परिच्छिन्नता (स्वल्परूपता) से रहित साक्षी चेतन में किसी कारण
के बिना ही जगत्, संकल्पकारक चित्त, अज्ञान आदि भासते हैं, अतः साक्षी चेतन में रूपादि का
अवसर ही कैसे ?