Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
बोधस्यान्तरिदं विश्वं स्थितमेव रघूद्वह ।
स्तम्भस्यान्तर्यथा शालभञ्जिका प्रकटीकृता ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
बीज से वृक्ष बाहर निकलता है, यह व्ष्टान्त विषम है, इस प्रकार की आशंका कर समान
हृष्टान्त बतलाते हैं / अथवा यदि विश्व शीतर ही उत्पन्न होता, तो वह भीतर ही रहता, पर वह तो
बाहर रहता हैं, इस पर कहते हैं ।
रघुश्रेष्ठ हे श्रीरामजी, बोधात्मा के भीतर स्थित ही यह विश्व बाहर के रूप में ऐसे प्रकट हुआ
है, जैसे खंभे के भीतर ही स्थित कठपुतली