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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । कः करोति शरीराणि मनोबुद्ध्यादिचेतनैः । को मोहयति भूतानि स्नेहरागादिबन्धनैः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

यह आपकी बात हम मानते हैं; पर भोग के आधार शरीरादि का कर्म आदि द्वारा या स्राक्षात्‌ कोई निर्माण करनेवाला तो अवश्य मानना चाहिए, क्योकि प्रत्येक कार्य कर्ता द्वारा ही बनता है / अतः उ देह में जीव को बैठाकर विषयों से मोहित करनेवाला कड दूसरा रहना ही चाहिए, क्योकि मोहित करनेवाले को छोड़कर चेतन में मोह हो नहीं सकता। ऐसी स्थिति में मोहित होनेवाला और मोहित करनेवाला यो दो भिन्न-भिन्न जीव एवं ईश्वरनामक वेतन सृष्टि आदि की प्रतिपादक श्रुतियों के आधार पर मानना चाहिए / इस प्रकार फ़िर रामजी का करते हैं श्रीरामजी ने कहा : भगवन्‌, मन, बुद्धि चेतन आदि से युक्त इन शरीरों की रचना करनेवाला कौन है और प्राणियों को स्नेह, राग आदि बन्धनों के द्वारा कौन मोहित करता है ? यह हमसे कहिए